82 लाख का कम्प्यूटर घोटाला फिर सुर्खियों में

PUBLISHED : Apr 27 , 6:29 AMBookmark and Share



0    दो ए.डी.जी. रेंक के पुलिस आॅफिसर बने आरोपी
0    ई.ओ.डब्ल्यू. ने जाँच प्रमाणित की
( डाॅ. नवीन आनंद जोशी )

भोपाल /    देशभक्ति और जनसेवा का नारा लगाने वाली पुलिस खुद ही भ्रष्टाचार के सारे पैमाने तोड़ती जा रही है इसका एक ताजा उदाहरण पुलिस के 82 लाख के कम्प्यूटर घोटाले से उजागर हुआ है । सूत्र बताते हैं कि ए.डी.जी. आर.के. गर्ग ने प्राथमिक जाँच करके मामला ई.ओ.डब्ल्यू. (आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो) में दर्ज कराया जहाँ से इसे प्रमाणित करते हुए शासन को भेजा जा चुका है ।
    गौरतलब है कि पुलिस सुधार के ए.डी.जी. पुरूषोत्तम शर्मा और उनके साथी ए.डी.जी. बी. मारिया कुमार पर प्रकरण पंजीबद्ध हुआ है । ब्यूरो के ए.डी.जी. विजय यादव की मानें तो यह प्रकरण पूर्व डी.जी.पी. नंदन दुबे के समय जाँच के लिये आया था, जिसकी सूक्ष्मता से जाँच की गई । जाँच उपरांत प्रकरण में जो तथ्य आए हैं, उनके आधार पर आगे की कार्यवाही की जाएगी ।
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मध्यप्रदेश पुलिस की सुप्रीम कोर्ट में फजी़हत
0    बड़े पुलिस अफसरों पर ठोका हर्जाना
0    दण्ड की राशि सरकारी खजाने से जमा करने की कोशिशें
( डाॅ. नवीन आनंद जोशी )

भोपाल /    सायबर क्राईम के एक मामले में मध्यप्रदेश पुलिस की सुप्रीम कोर्ट में न केवल किरकिरी हुई बल्कि राज्य के आधा दर्जन पुलिस अधिकारियों पर गलत ढंग से प्रकरण बनाने और गिरफ्तार करने की याचिका में याचिकाकर्ता को तंग करने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने सभी पर भारी भरकम हर्जाना वसूलने का आदेश पारित किया । गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में 7 अप्रैल को रिट पिटीशन क्रमांक 30/2015 जिसमें पुणे निवासी रिनी जौहर और गुलशन जौहर को गलत ढंग से म.प्र. पुलिस द्वारा गिरफ्तार किये जाने का प्रकरण सुनवाई में लिया गया था जिसमें आई.जी. अनिल गुप्ता, ए.आई.जी. दीपक ठाकुर, प्रधान आरक्षक इशरत जहाँ, आरक्षक इन्द्रपाल और सौरभ भट्ट तथा एडवोकेट विक्रम राजपूत को दोषी माना गया है ।
    याचिकाकर्ता रिनी जौहर ने अपने साथ हुए अत्याचार और अमानवीय कृत्य की शिकायत मानव अधिकार, राज्य पुलिस, उच्च न्यायालय में पहले ही की थी किन्तु उस वक्त तत्कालीन आई.जी. आर.के. मिश्रा और ए.डी.जी. साइबर शैलेष सिंह जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी, वे इसमें बच गए क्योंकि जौहर को इनके नाम पता नहीं थे जबकि विक्रम सिंह राजपूत एडवोकेट (जबलपुर) अभी भी फरार हैं ।
कुछ बड़े अफसर जिन्होंने उलझाया केस:-
    सायबर सेल के मामले में शैलेष सिंह, आर.के. मिश्रा तो बगैर पहचान के बच गए लेकिन ए.डी.जी. सी.आई.डी. जी.पी. सिंह एवं डी.पी. सिंह (डी.एस.पी.) ने झूठे और फर्जी बयान दिखाकर रिनी जौहर और गुलशन गौहर को आरोपी बना डाला । जबकि पंकज श्रीवास्तव ने स्वमेव झूठी और बनावटी रिपोर्ट को अभ्यावेदन बनाकर आगे प्रस्तुत कर दिया । दूसरी तरफ जी.पी. सिंह ने डीजीपी को संबोधित करते हुए इसमें सुरेन्द्र सिंह डीजीपी को भी लपेटे में ले लिया ।
सरकार खजाने से नहीं वेतन से होगी वसूली:-
 उच्चतम न्यायालय ने मामले की गंभीरता को समझते हुए अपराध क्रमांक 24/2012 में सभी पुलिस अधिकारियों को दोषी मानते हुए स्पष्ट निर्देश दिये हैं कि वे अपने पद के हिसाब से हर्जाना जमा करें, वैधानिक प्रक्रिया अनुसार जब कोई लोक सेवक अपनी वैध ड्यूटी के दौरान वैध कार्य करता है, तब 197 दं.प्र.सं. का संरक्षण उसे मिलता है और यदि कोई कोर्ट बतौर जुर्माना अवैधानिक कृत्य बताते हुए जुर्माना करती है तो उसकी वसूली वेतन से होती है, न कि शासन   से । इस मामले में सारे पुलिस अधिकारी खुद हर्जाना भरने के स्थान पर सरकार से भरपाई कराने की कोशिश में लगे हैं ।
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मध्यप्रदेश माध्यम का अधिकारी फंसा
0    यौन प्रताड़ना के मामले के बाद एल.ई.डी. लूट का मामला
0    आई.पी.एस. की रिश्तेदारी बचा रही राकेश गौतम को 
( डाॅ. नवीन आनंद जोशी )

भोपाल /    मूल रूप से मध्यप्रदेश माध्यम के अधिकारी रहे राकेश गौतम इन दिनों चर्चाओं में हैं इनके द्वारा भोपाल की एक अल्पसंख्यक महिला के साथ यौन प्रताड़ना का प्रकरण रायसेन में विचाराधीन है, जिसमें न्याय न मिलने की दशा में उसने खुदकुशी करने की कोशिश की थी । अभी इस मामले की जाँच पूरी नहीं हुई है और गौतम जो अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी पंचायत रायसेन ने (ग्राम पंचायत सतलापुर, पीपल्या गज्जू, सराकिया और लोरका) पाँच पंचायलों को दिये गये एल.ई.डी. यह कहकर ले लिये कि इन्हें दुबारा पंचायतों में लगाया जाएगा । दिनांक 30.07.2015 को धारा 409, 420, 120-बी यानि गबन, धोखाधड़ी का प्रकरण पुलिस थाने में पंचायतकर्मियों ने दर्ज करा दिया है । खुद को आई.पी.एस. अधिकारी के.एन. तिवारी एडीजी एस.ए.एफ. का साला बताने वाला गौतम कोतवाली रायसेन के प्रकरण में न्यायालय से अग्रिम जमानत पर है ।

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