फल खाएं या नहीं, रिसर्च से उठा है नया सवाल, ज्यादा खाने से होता है यह

PUBLISHED : Oct 15 , 8:11 AMBookmark and Share


 फल खाएं या नहीं, रिसर्च से उठा है नया सवाल, ज्यादा खाने से होता है यह

फल खाने से भले ही आपके ब्लड शुगर का स्तर ऊपर न हो, लेकिन यह आपके लिवर को ज्यादा फैट्स जमा करने  पर मजबूर कर सकता है। अमेरिका के मैसेच्यूसेट्स के जोसलिन डायबिटिक सेंटर की एक नई रिसर्च से यह बात सामने आई है। सेल मेटाबोलिज्म में प्रकाशित रिसर्च ने इस बात पर ही सवालिया निशान लगा दिया है कि हमें फल खाने चाहिए या नहीं।

फल क्यों खाएं?

हममें से जो लोग स्वीट टूथ यानी मीठा खाने की आदत से परेशान हैं उनके लिए ताजे फल खाना एक किस्म का समझौता ही होता है। चेरी, सेब, स्ट्रॉबेरी जैसे फलों का ग्लाइसेमिक्स इंडेक्स (जीआई) कम होता है। उदाहरण के लिए 120 ग्राम सेब का जीआई 30 ग्राम गेहूं या राई ब्रेड के बराबर होता है। संतरों का जीआई तो गेहूं की रोटियों से भी कम होता है। जीआई वह पैमाना है जो यह बताता है कि हमारा शरीर उस खाद्य पदार्थ में मौजूद शुगर को कितनी देर में ग्लुकोज में बदल देगा। जीआई जितना ज्यादा होगा, वह खाद्य पदार्थ उतनी ही तेजी से हमारे ब्लड शुगर के स्तर को ऊपर उठा देगा। 55 से कम जीआई को मध्यम माना जाता है जबिक 70 से ज्यादा को अधिक माना जाता है। चेरी का जीआई स्तर 20, सेब का 39 और स्ट्रॉबेरीज का 41 होता है।

फल खाने की एक अन्य वजह होती है उसमें मौजूद कई सारे एंटीऑक्सिडेंट्स, विटामिन्स और मिनरल्स जो स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते हैं। डॉक्टर तो डायबिटीज के मरीजों को कुछ फल, जैसे चेरी आदि खाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। शर्त केवल इतनी होती है कि फल खाने वालों को अन्य आहार कम करके अपने दैनिक कैलोरी के संतुलन को साधना चाहिए। उन्हें आम और केले जैसे फल टालना चाहिए।

 

फलों को लेकर चर्चा

फल खाना चाहिए या नहीं इसे लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों में काफी अरसे से बहस चलती रही है। फलों में फ्रक्टोस होता है जो शुगर का एक सामान्य रूप है। कुछ रिसर्चरों के मुताबिक जहां चिंता की कोई बात नहीं है, बीच-बीच में कभी-कभार फलों और फ्रक्टोस के स्वास्थ्य पर बुरे असर की चर्चा होने लगती है।

इस चर्चा में मोटापे से लेकर डायबिटीज के ज्यादा खतरे और अन्य मेटाबोलिक बीमारियों का जिक्र हो जाता है। अब जोसलिन डायबिटिक सेंटर के रिसर्चरों ने पाया है कि फ्रक्टोस का ज्यादा सेवन फैटी लिवर डिसीज का खतरा तो बढ़ाता ही है, इससे मेटाबोलिक बीमारियों की आशंका भी बढ़ जाती है।

एक विज्ञप्ति में जोसलिन के चीफ अकेडमिक ऑफिसर और रिसर्च पेपर के लीड ऑथर सी. रोनाल्ड कान खुलासा करते हुए बताते हैं, “आहार में फ्रक्टोस को शामिल करने से लिवर ज्यादा फैट स्टोर करने लगता है और यह लिवर के साथ-साथ पूरे शरीर के मेटाबोलिज्म के लिए खराब होता है।” कान व अन्य के मुताबिक, यही ज्यादा फ्रक्टोस और ज्यादा वसा वाले आहार को लेने पर होता है।

पहले यह लिवर को वसा को जलाने वाले एन्जाइम, एसिल्केर्नाइटिन्स की ज्यादा मात्रा स्रावित करने पर मजबूर करता है।

उसके बाद यह सेल मिटोकोंड्रिया, ग्लुकोज को शरीर की ऊर्जा में बदलने वाली ओवल के आकार की संरचना, के बिखराव की वजह बनता है। टूटे हूए मिटोकोंड्रिया इससे अपना जटिल नेटवर्क गंवाकर छोटी-छोटी थैलियों जैसी संरचना (वेसिकल्स) में तब्दील हो जाते हैं जो अच्छी तरह से काम नहीं करते।

इन दो कारणों से लिवर ज्यादा फैट बनाता है और स्टोर भी करता है। यह हमारे मेटाबोलिज्म में और अधिक गडबडी की वजह बनता है। हैरानी की बात यह है कि हाई फैट, हाई-ग्लुकोज डायट में एसिलकार्निटाइन्स का स्तर कम होता है। केवल ग्लुकोज आधारित डायट का भी लिवर पर ज्यादा असर नहीं होता।

पुरानी बहस

जोसलिन का रिसर्च जबकि अभी नया है, फ्रक्टोस और फल खाने की बहस बहुत पुरानी है।

2012 के एक अध्ययन के मुताबिक फ्रक्टोस मेटाबोलिज्म फैटी एसिड्स का ज्यादा मात्रा में उत्पादन करता है जो कि अंततः मोटापे और वजन में इजाफे के लिए जिम्मेदार होता है। उससे भी पहले 2010 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक फ्रक्टोस से भरपूर आहार का बहुत ज्यादा मात्रा में सेवन करने से इन्सुलिन और डायबिटीज का शमन (सप्रेशन) होता है। इससे ब्लड प्रेशर का स्तर भी ज्यादा हो जाता है।

एक अन्य अध्ययन के मुताबिक ताजा फल खाने से गर्भवती महिलाओं में गर्भावस्था के डायबिटीज होने के आसार ज्यादा हो जाते हैं।

तो क्या फल वाकई खराब हैं?

जवाब साधारण से हां या ना की जगह कुछ ज्यादा ही जटिल है।

फलों में फ्रक्टोस से ज्यादा कुछ होता है। उनमें एंटीऑक्सिडेंट्स, पोषक तत्व, फाइबर होते हैं जो सभी हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छे होते हैं। इसलिए सभी फलों पर खराब होने का आरोप लगाने की जगह बेहतर होगा कि हम उनका संतुलित मात्रा में सेवन करें। एक बात ध्यान में रखना चाहिए कि सभी रिसर्च में ज्यादा फ्रक्टोस वाली डायट के दुष्परिणामों को बताया गया है।

तो कितने फल खाना बहुत ज्यादा है? फल और सब्जियों प्रत्येक के 80 ग्राम का दिन में पांच बार सेवन करने की सिफारिश की जाती है। इसका सख्ती से पालन करें और आपको हाई फ्रक्टोस डायट के खतरों से निजात मिल जाएगी। साथ ही जब कभी भी आप फल खरीदें तो कुछ बातों पर गौर करें-पहला इसमें मौजूद कैलोरी, जीआई, और दूसरा ग्लाइसेमिक लोड (उसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट्स)।

आम और पाइनेप्पल जैसे फल फ्रक्टोस के लिहाज से सामान्य से ज्यादा जीआई की श्रेणी में आते हैं इसलिए इनका सेवन कम मात्रा में किया जाना चाहिए। दूसरी ओर सेब और संतरे जैसे फलों का जीआई कम होता है और उन्हें आप कुछ ज्यादा खा सकते हैं।

जैसा कि हमेशा होता है सारा खेल आपके स्वास्थ्य और उम्र के हिसाब से आहार का संतुलन साधने का है।

अधिक जानकारी के लिए देखेंः

https://www.myupchar.com/disease/diabetes

स्वास्थ्य आलेख www.myUpchar.com द्वारा लिखे गए हैं,

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